श्री रामचरितमानस की महिमा
गतांक मैं आगे...........
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परमात्मा ने अपनी पूरी पूरी शक्ति "राम नाम" में रख दी है । नाम जप के लिए कोई स्थान, पात्र, विधि की जरुरत नही है । रात दिन राम नाम का जप करो निषिद्धपापाचरण आचरणों से स्वतः ग्लानी हो जायेगी । अभी अंतकरण मैला है इसलिए मलिनता अच्छी लगती है मन के शुद्ध होने पर मैली वस्तुओं कि अकांक्षा नहीं रहेगी । जीभ से राम राम शुरू कर दो मन की परवाह मत करो । ऐसा मत सोचो कि मन नहीं लग रहा है तो जप निरर्थक चल रहा है । जैसे आग बिना मन के छुएंगे तो भी वह जलायेगी ही उसी प्रकार से भगवान् का नाम किसी तरह से, किसी भी रूप में लिया जाए , अंतर्मन को निर्मल ही करेगा ही। अभी मन नहीं लग रहा है तो परवाह नहीं करो , क्योंकि आपकी नियत तो मन लगाने की है तो मन लग जाएगा , जैसे-जैसे आप भगवान का नाम जब ते चले जाएंगे भगवान का नाम लेते चले जाएंगे वैसे-वैसे भगवान के चरणों में आपकी श्रद्धा भी लगातार बढ़ती चली जाएगी नवधा भक्ति का ज्ञान देते हुए भगवान श्री रामचंद्र जी ने माता शबरी को बताया है कि प्रथम भगति संतन कर संगा । दूसर रति मम कथा प्रसंगा।। भगवान ह्रदय की बात देखते हैं की यह मन लगाना चाहता है , लेकिन मन नहीं लग पा रहा है .इसलिए मन नहीं लगे तो घबराओ मत और जाप करते करते मन लगाने का प्रयत्न करो ।भगवान शरण में आने वाले को मुक्ति देते हैं, भगवान का नाम उच्चारण मात्र से मुक्ति दे देते है जैसे छतरी के नीचे खड़ा व्यक्ति बारिश से भीगने से बच जाता है बिल्कुल वैसे ही भगवान के नाम के छतरी के नीचे जो खड़ा है वह समस्त प्रकार के संकटों से बच जाता है। राम रूपी धन जिसके पास है वही असली धनपति है । सुगति रूपी जो सुधा है वह सदा के लिए तृप्त करने वाली होती है। जिस लाभ के बाद में कोई लाभ नहीं बच जाता है जहां कोई दुःख नहीं पहुँच सकता है ऐसे महान आनंद को राम नाम प्राप्त करवाता है ।
ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में चक्रवर्ती महाराज राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी भगवान श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है 'राम'। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।
"रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।"
("जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं 'राम' ")
एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।
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एक नाम जाप होता है और एक मंत्र जाप होता है . राम नाम मन्त्र भी है और नाम भी।
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सहसा एक कथा याद आ गई उल्लेख करना चाहूंगा। मुनि वाल्मीकि जी ने सौ करोड़ श्लोकों की रामायण बनाई , तो सौ करोड़ श्लोकों की रामायण को भूतभावन भगवान शंकर के आगे रख दिया जो सदैव राम नाम जपते रहते हैं । उन्होनें उसका उपदेश पार्वती को दिया तत्पश्चात भगवान शंकर जी ने रामायण के तीन भाग कर त्रिलोक में बाँट दिया । तीन लोकों को तैंतीस – तैंतीस करोड़ दिए तो एक करोड़ बच गया । उसके भी तीन टुकड़े किए , तो एक लाख बच गया उसके भी तीन टुकड़े किये तो एक हज़ार बच और उस एक हज़ार के भी तीन भाग किये तो सौ बच गया . उसके भी तीन भाग किए एक श्लोक बच गया । इस प्रकार एक करोड़ श्लोकों वाली रामायण के तीन भाग करते करते एक "अनुष्टुप श्लोक" बचा रह गया . एक अनुष्टुप छंद के श्लोक में बत्तीस अक्षर होते हैं उसमें दस – दस करके तीनों को दे दिए तो अंत में दो ही अक्षर बचे भगवान् शंकर ने यह दो अक्षर रा और म आपने पास रख लिए . राम अक्षर में ही पूरी रामायण है , पूरा शास्त्र है , पूरी सृष्टि समाहित है।
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भगवान् के नाम और रूप दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि है . सुन्दर, शुद्ध , भक्ति युक्त बुद्धि से ही इसका दिव्य अविनाशी स्वरुप जानने में आता है । राम नाम लोक और परलोक में निर्वाह करने वाला होता है । लोक में यह देने वाला चिंतामणि और परलोक में भगवत्दर्शन कराने वाला है । वृक्ष में जो शक्ति है वह बीज से ही आती है इसी प्रकार अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा में जो शक्ति है वह राम नाम से आती है।
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गोस्वामी तुलसीदास जी रचित श्री रामचरितमानस में बाबा तुलसीदास भगवान की महिमा का बखान करते हुए पुण्यसलिला श्रीरामनामरूपीगंगा में डुबकी लगाते हुए लिखते हैं।
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नाम रूप गति अकथ कहानी।
समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी।
उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥
(नाम और रूप की गति की कहानी (विशेषता की कथा) अकथनीय है। वह समझने में सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुंदर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान कराने वाला चतुर दुभाषिया है॥)
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नाम कामतरु काल कराला।
सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता।
हित परलोक लोक पितु माता॥
(ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)॥)
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नहिं कलि करम न भगति बिबेकू।
राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू।
नाम सुमति समरथ हनुमानू॥
(कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्जी हैं॥)
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राम नाम नरकेसरी
कनककसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि
पालिहि दलि सुरसाल॥
(राम नाम श्री नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करने वाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी दैत्य) को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥)
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भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा।
करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
(अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) राम नाम का स्मरण करके और श्री रघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ॥)
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ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें।
द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥
कलि केवल मल मूल मलीना।
पाप पयोनिधि जन मन मीना॥
(पहले (सत्य) युग में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान प्रसन्न होते हैं, परन्तु कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥)
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चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका।
भए नाम जपि जीव बिसोका॥
बेद पुरान संत मत एहू।
सकल सुकृत फल राम सनेहू॥
((केवल कलियुग की ही बात नहीं है,) चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्यों का फल श्री रामजी में (या राम नाम में) प्रेम होना है॥)
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श्री राम जय राम जय जय राम के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक उद्धरण लिखा है।
"श्रीराम’—यह भगवान राम के प्रति पुकार है,
"जय राम"—यह उनकी स्तुति है,
'‘जय जय राम’'—यह उनके प्रति पूर्ण समर्पण है ।
संसार का मूल कारण सत्व, रज और तम—ये त्रिगुण हैं । ये तीनों ही भव-बंधन के कारण हैं । इन तीनों पर विजय पाने और संसार में सब कुछ ‘राम’ मानने की शिक्षा देने के लिए इस मन्त्र में तीन बार ‘राम’ और तीन ही बार ‘जय’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
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शेष अगले अंक में.........
प्रभु चरणों का सेवक
डॉ राहुल श्रीवास्तव
९३०१३६०६१९
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(प्रभु चरणों के दास के रूप में मैं मेरी अल्प बुद्धि के आधार पर श्री रामचरितमानस जी की महिमा को शब्दों में संजोने की एक कोशिश कर रहा हूं एक प्रयास कर रहा हूं और भगवान के श्री चरणों की भक्ति भगवान को समर्पित कर लिख रहा हूं यदि इस लेख में किसी भी प्रकार की कोई त्रुटि हो तो भगवान श्री रामचंद्र जी मुझे अज्ञानी समझकर क्षमा करेंगे। आप सभी सुधि पाठक गण से अनुरोध है कि यदि आपको इस लेख में किसी प्रकार की कोई त्रुटि दीख पड़े तो कृपया ब्लॉक के कमेंट बॉक्स में जाकर आप अपना प्रश्न या उसी के बाबत लिख दें जिससे कि हम उस त्रुटि का सुधार कर सके । आप सभी लोगों के सुझाव और मार्गदर्शन हमेशा अपेक्षित रहेंगे।
जय श्री राम
जय जय श्री राम।। )
गतांक मैं आगे...........
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परमात्मा ने अपनी पूरी पूरी शक्ति "राम नाम" में रख दी है । नाम जप के लिए कोई स्थान, पात्र, विधि की जरुरत नही है । रात दिन राम नाम का जप करो निषिद्धपापाचरण आचरणों से स्वतः ग्लानी हो जायेगी । अभी अंतकरण मैला है इसलिए मलिनता अच्छी लगती है मन के शुद्ध होने पर मैली वस्तुओं कि अकांक्षा नहीं रहेगी । जीभ से राम राम शुरू कर दो मन की परवाह मत करो । ऐसा मत सोचो कि मन नहीं लग रहा है तो जप निरर्थक चल रहा है । जैसे आग बिना मन के छुएंगे तो भी वह जलायेगी ही उसी प्रकार से भगवान् का नाम किसी तरह से, किसी भी रूप में लिया जाए , अंतर्मन को निर्मल ही करेगा ही। अभी मन नहीं लग रहा है तो परवाह नहीं करो , क्योंकि आपकी नियत तो मन लगाने की है तो मन लग जाएगा , जैसे-जैसे आप भगवान का नाम जब ते चले जाएंगे भगवान का नाम लेते चले जाएंगे वैसे-वैसे भगवान के चरणों में आपकी श्रद्धा भी लगातार बढ़ती चली जाएगी नवधा भक्ति का ज्ञान देते हुए भगवान श्री रामचंद्र जी ने माता शबरी को बताया है कि प्रथम भगति संतन कर संगा । दूसर रति मम कथा प्रसंगा।। भगवान ह्रदय की बात देखते हैं की यह मन लगाना चाहता है , लेकिन मन नहीं लग पा रहा है .इसलिए मन नहीं लगे तो घबराओ मत और जाप करते करते मन लगाने का प्रयत्न करो ।भगवान शरण में आने वाले को मुक्ति देते हैं, भगवान का नाम उच्चारण मात्र से मुक्ति दे देते है जैसे छतरी के नीचे खड़ा व्यक्ति बारिश से भीगने से बच जाता है बिल्कुल वैसे ही भगवान के नाम के छतरी के नीचे जो खड़ा है वह समस्त प्रकार के संकटों से बच जाता है। राम रूपी धन जिसके पास है वही असली धनपति है । सुगति रूपी जो सुधा है वह सदा के लिए तृप्त करने वाली होती है। जिस लाभ के बाद में कोई लाभ नहीं बच जाता है जहां कोई दुःख नहीं पहुँच सकता है ऐसे महान आनंद को राम नाम प्राप्त करवाता है ।
ऐसी बात नहीं है कि अवधपुरी में चक्रवर्ती महाराज राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं। नहीं, राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी भगवान श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है 'राम'। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है।
"रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।"
("जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं 'राम' ")
एक राम घट-घट में बोले,
दूजो राम दशरथ घर डोले।
तीसर राम का सकल पसारा,
ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।।
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एक नाम जाप होता है और एक मंत्र जाप होता है . राम नाम मन्त्र भी है और नाम भी।
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सहसा एक कथा याद आ गई उल्लेख करना चाहूंगा। मुनि वाल्मीकि जी ने सौ करोड़ श्लोकों की रामायण बनाई , तो सौ करोड़ श्लोकों की रामायण को भूतभावन भगवान शंकर के आगे रख दिया जो सदैव राम नाम जपते रहते हैं । उन्होनें उसका उपदेश पार्वती को दिया तत्पश्चात भगवान शंकर जी ने रामायण के तीन भाग कर त्रिलोक में बाँट दिया । तीन लोकों को तैंतीस – तैंतीस करोड़ दिए तो एक करोड़ बच गया । उसके भी तीन टुकड़े किए , तो एक लाख बच गया उसके भी तीन टुकड़े किये तो एक हज़ार बच और उस एक हज़ार के भी तीन भाग किये तो सौ बच गया . उसके भी तीन भाग किए एक श्लोक बच गया । इस प्रकार एक करोड़ श्लोकों वाली रामायण के तीन भाग करते करते एक "अनुष्टुप श्लोक" बचा रह गया . एक अनुष्टुप छंद के श्लोक में बत्तीस अक्षर होते हैं उसमें दस – दस करके तीनों को दे दिए तो अंत में दो ही अक्षर बचे भगवान् शंकर ने यह दो अक्षर रा और म आपने पास रख लिए . राम अक्षर में ही पूरी रामायण है , पूरा शास्त्र है , पूरी सृष्टि समाहित है।
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भगवान् के नाम और रूप दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि है . सुन्दर, शुद्ध , भक्ति युक्त बुद्धि से ही इसका दिव्य अविनाशी स्वरुप जानने में आता है । राम नाम लोक और परलोक में निर्वाह करने वाला होता है । लोक में यह देने वाला चिंतामणि और परलोक में भगवत्दर्शन कराने वाला है । वृक्ष में जो शक्ति है वह बीज से ही आती है इसी प्रकार अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा में जो शक्ति है वह राम नाम से आती है।
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गोस्वामी तुलसीदास जी रचित श्री रामचरितमानस में बाबा तुलसीदास भगवान की महिमा का बखान करते हुए पुण्यसलिला श्रीरामनामरूपीगंगा में डुबकी लगाते हुए लिखते हैं।
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नाम रूप गति अकथ कहानी।
समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी।
उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥
(नाम और रूप की गति की कहानी (विशेषता की कथा) अकथनीय है। वह समझने में सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुंदर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान कराने वाला चतुर दुभाषिया है॥)
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नाम कामतरु काल कराला।
सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता।
हित परलोक लोक पितु माता॥
(ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)॥)
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नहिं कलि करम न भगति बिबेकू।
राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू।
नाम सुमति समरथ हनुमानू॥
(कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्जी हैं॥)
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राम नाम नरकेसरी
कनककसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि
पालिहि दलि सुरसाल॥
(राम नाम श्री नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करने वाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी दैत्य) को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥)
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भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा।
करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
(अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) राम नाम का स्मरण करके और श्री रघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ॥)
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ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें।
द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥
कलि केवल मल मूल मलीना।
पाप पयोनिधि जन मन मीना॥
(पहले (सत्य) युग में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान प्रसन्न होते हैं, परन्तु कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥)
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चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका।
भए नाम जपि जीव बिसोका॥
बेद पुरान संत मत एहू।
सकल सुकृत फल राम सनेहू॥
((केवल कलियुग की ही बात नहीं है,) चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्यों का फल श्री रामजी में (या राम नाम में) प्रेम होना है॥)
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श्री राम जय राम जय जय राम के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक उद्धरण लिखा है।
"श्रीराम’—यह भगवान राम के प्रति पुकार है,
"जय राम"—यह उनकी स्तुति है,
'‘जय जय राम’'—यह उनके प्रति पूर्ण समर्पण है ।
संसार का मूल कारण सत्व, रज और तम—ये त्रिगुण हैं । ये तीनों ही भव-बंधन के कारण हैं । इन तीनों पर विजय पाने और संसार में सब कुछ ‘राम’ मानने की शिक्षा देने के लिए इस मन्त्र में तीन बार ‘राम’ और तीन ही बार ‘जय’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
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शेष अगले अंक में.........
प्रभु चरणों का सेवक
डॉ राहुल श्रीवास्तव
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(प्रभु चरणों के दास के रूप में मैं मेरी अल्प बुद्धि के आधार पर श्री रामचरितमानस जी की महिमा को शब्दों में संजोने की एक कोशिश कर रहा हूं एक प्रयास कर रहा हूं और भगवान के श्री चरणों की भक्ति भगवान को समर्पित कर लिख रहा हूं यदि इस लेख में किसी भी प्रकार की कोई त्रुटि हो तो भगवान श्री रामचंद्र जी मुझे अज्ञानी समझकर क्षमा करेंगे। आप सभी सुधि पाठक गण से अनुरोध है कि यदि आपको इस लेख में किसी प्रकार की कोई त्रुटि दीख पड़े तो कृपया ब्लॉक के कमेंट बॉक्स में जाकर आप अपना प्रश्न या उसी के बाबत लिख दें जिससे कि हम उस त्रुटि का सुधार कर सके । आप सभी लोगों के सुझाव और मार्गदर्शन हमेशा अपेक्षित रहेंगे।
जय श्री राम
जय जय श्री राम।। )

